देखिए विडियो: उत्तराखण्ड़ की लाजवाब ककड़ी पार्टी का आनन्द! आपके मुह में भी आ जायेगा पानी..
वैसे तो ककड़ी हमारे आयदिन के भोजन का अहम हिस्सा है लेकिन स्वाद व गुणवक्ता के मामले में उत्तराखण्ड़ के पहाड़ी ककड़ी की बात ही कुछ निराली है, बेहद स्वादिष्ट पहाड़ी ककड़ी में जब सिलोटा में पीसा हुआ लौंण (हरा धनिया, हरी मिर्च लहसून युक्त नमक) मिलाकर खाया जाए तो दुनिया का हर फास्ट फूड इसके सामने फिका नजर आता है, और अगर दोस्तों के बीच महफिल में पहाड़ी ककड़ी पार्टी कर इसका आनन्द लिया जाए तो फिर पुछिए मत हर पहाड़ी को पता है कि इसका क्या आनन्द आता है। रूद्रप्रयाग के एक गांव में भी ऐसी ही पहाड़ी ककड़ी पार्टी का आनन्द महफिल का नजारा हम आपको दिखाने वाले हैं, महफिल में फेसबुक पर चर्चित भरतू की ब्यारी के लेखक नवल खली, न्यूज 18 संवाददाता रूद्रप्रयाग शैलेन्द्र सिंह रावत, तहलका न्यूज रिर्पोटर कुलदीप नेगी, पंजाब केसरी रिर्पोटर भूपेन्द्र भण्डारी और मैं (सत्यापाल नेगी, स्वतन्त्र पत्रकार) पहाड़ी ककड़ी पार्टी का आनन्द ले रहे हैं, तो आप देखिए हमारी इस महफिल की रसभरी छुंई बात...
देखिए VIDEO: पहाड़ी ककड़ी पार्टी का आनन्द लेते पहाड़ी युवा।
उत्तराखण्ड के उच्च पर्वतीय क्षेत्र उगायी जाने वाली ककडी अपने खास स्वाद की वजह से आज अपने आप में एक ब्रांड है जिसको सिर्फ खाने पश्चात ही समझा जा सकता है. अत्यधिक मांग में रहने वाली पहाड़ी ककड़ी उत्तराखण्ड में बहुतायत उगायी जाती है. इसका वैज्ञानिक नाम Cucumis sativus L. जो की Cucurbitaceae कुल के अंतर्गत आती है. विश्वभर में लगभग सभी जगह उगायी जाने वाली ककडी को अनेकों नामों से जाना जाता है जैसे कि खीरा, ककडी- उर्दू, पेपिनो-स्पेनीस, हुआंग गुआ- चाइनीज, क्यूरी- जापानीस, पिपिगंगना-श्रीलंका आदि. इसके अलावा पूरे देश में लगभग 1600 मी0 (समुद्रतल से) तक की ऊंचाई पर उगाई जाने वाली ककडी को हिन्दी में खीरा, ककडी, बंगाली में साउसा, तमिल में वेलारिका, तेलगू में कीरा डोस्लाया, कन्नड में सवातेकाई, मराठी में सितालचीनी, गुजराती में ककडी, असम में तियोह आदि नामों से जाना जाता है।
पहाड़ी ककड़ी का उत्पादन पर्वतीय क्षेत्रों में बिना किसी रासायनिक खाद तथा अन्य कीटनाशक की सहायता से किया जाता है जिसके कारण इसकी अत्यधिक मांग रहती है. पहाड़ी ककड़ी की कीमत मैदानी क्षेत्रों में उगायी जाने वाली ककडी से अधिक होने के बाद भी बाजार में ज्यादा पसंद की जाती है. उत्तराखण्ड के कुमाऊं तथा गढवाल क्षेत्रों में पहाड़ी ककड़ी का खूब उत्पादन किया जाता है, जो कि स्थानीय काश्तकारों को आर्थिकी का मजबूत विकल्प है. पहाड़ी ककड़ी में प्राकृतिक मिनरल्स तथा विटामिन्स प्रचूर मात्रा में हाने के कारण स्थानीय लोगों द्वारा कृषि कार्यों के दौरान खेतों में एक ऊर्जा के विकल्प में खूब पंसद किया जाता है. पहाड़ी ककड़ी का प्रदेशभर में अच्छा उत्पादन किया जाना चाहिए ताकि इसे प्रदेश की आर्थिकी का ओर मजबूत विकल्प बनाया जा सकें. उत्तराखण्ड में पारम्परिक रूप से पहाडी ककडी को कीचन गार्डन तथा पारम्परिक फसलों के बीच में उगाई जाती है।
सामान्यतः ककडी का उपयोग खाने में सलाद तथा रायते में किया जाता है लेकिन इसके अलावा इसको विभिन्न खाद्य पदार्थों में मिलाकर भी प्रयोग में लाया जाता है जैसे कि पर्वतीय क्षेत्रों में इससे ’बडी’ बनायी जाती है. घरेलू उपयोग के अलावा इसका उपयोग कॉस्मेटिक उत्पाद, आयुर्वेदिक औषधियां तथा एनर्जी ड्रिंक्स बनाने में भी किया जाता है. इसमें एल्केलॉइडस, ग्लाइकोसाइड्स, स्टेरोइड्स, केरोटीन्स, सेपोनिन्स, अमीनो एसिड, फलेवोनोइड्स तथा टेनिन्स आदि रासायनिक अवयव पाये जाते है. ककडी में पोषक तत्व तथा मिनरल्स प्रचूर मात्रा में पाये जाते है तथा इसमें मौजूद विटामिन्स-’ए’, ’बी’ तथा ’सी’ की मात्रा होने से यह शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढाने में सहायता करती है. इसमें ऊर्जा-16 किलो कैलोरी, कार्बाइाइड्रेट- 3.63g, डाइटरी फाइबर- 0.5g, वसा- 0.11 g, प्रोटीन- 0.65 g, फोलेट्स- 7.0 मी0g, विटामिन ’बी’- 0.25 Mg, विटामिन ’सी’- 2.8 Mg, विटामिन ’k - 16.4 Mg, सोडियम- 2.0 Mg, पोटेशियम- 14.7 Mg, फोस्फोरस- 24 Mg, कैल्शियम- 16 Mg, कॉपर- 0.17 Mg, आयरन- 0.3 Mg, मैग्नीशियम- 13 Mg, मॅग्नीज़ - 0.08 Mg, फ्लोराइड- 1.3 Mg तथा जिंक- 0.2 Mg तक की मात्रा में पाये जाते है।
यह जानकारी उत्तराखण्ड विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के महानिदेशक डॉ राजेन्द्र डोभाल के एक लेख से ली गयी है।
