नए वाहन अधिनियम का मत उड़ाओ मजाक, जीवन है जरूरी !
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| हरीश थपलियाल |
लोग शराब पी कर वाहन चलाये ओर भुगते कोई ओर । जो लोग मजाक में कहते है इस एक्ट में फांसी का प्रावधान नही है तो उस माँ से पूछो तो वो बताएगी की होना चाहिए या नही फांसी का प्रावधान।। सभी की नजर जुर्माने पर है पर कोई ये नही कहता कि हम कुछ बेहतर बने जिससे जुर्माना नही भरना पड़े। ये रोड पर खड़ा ट्राफिक का सिपाही जो तुमको विलेन नजर आता है अगर ये नही हो तो शायद कार वाला बाइक वाले को ओर ट्रक वाला कार को इस रोड पर नही चलने दे। जब तक कोई आपका अपना नही मरे तब तक इस मजाक को एन्जॉय कर ले बाद में शायद आपको ये इतना आंनद दायक नही लगेगा।
अंतिम बात वाहन जब तक वाहन है जब तक वह सही और प्रशिक्षित हाथो में है। वरना वो वेपन है और कोई समझदार व्यक्ति ये नही चाहेगा कि हथियार ऐसे हाथो में हो जो खुद इसकामहत्व और मारक शक्ति को नही समझता हो। चर्चा इस बात की भी हो रही है कि नोट बंदी से लेकर जल्दबाजी में लागू किये गए जी एस टी के प्रावधानों आदि के चलते देश की अर्थव्यवस्था को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए जो कदम सरकार द्वारा उठाए जा रहे हैं, नया यातायात नियम भी उसी आर्थिक वसूली अभियान का एक हिस्सा है।
बहरहाल इस संशोधित यातायात अधिनियम के बहाने जनता से आर्थिक वसूली का जो बहाना तलाश किया गया है क्या वह पूरी तरह न्यायसंगत है? क्या केवल जनता पर आर्थिक बोझ लाद देने से यातायात व्यवस्था में सुधार हो सकेगा? सरकार ने आम लोगों के लिए यातायात नियम तो इतने सख्त बना दिए गए हैं परन्तु क्या सरकार व प्रशासन की गलतियों या लापरवाहियों की वजह से जनता को होने वाले नुकसान, दुर्घटनाओं यहां तक कि लोगों की मौत का भी आखिर कोई जिम्मेदार है या नहीं? आखिर यह कैसा लोकतंत्र है जहां धर्म व सम्प्रदाय की बूटी सुंघा कर उन्हीं लोगों पर आर्थिक बोझ डाला जा रहा है जिन्होंने वर्तमान सरकार को सत्ता के सिंहासन पर बिठाने की 'गलती की थी?
यदि इस संशोधित मोटर व्हीकल अधिनियम 2019 को लागू करने के पीछे सरकार का मकसद चालकों को अनुशासित बनाना या दुर्घटनाएं रोकना है फिर आखिर सरकार व प्रशासन की लापरवाही व गलत नीतियों के चलते होने वाली दुर्घटनाओं का जिम्मेदार कौन है। क्या नए यातायात अधिनियम लागू करने वाली सरकार यह बताएगी कि सड़कों के गड्ढे या मेनहोल के खुले ढक्कन की वजह से होने वाली दुर्घटनाओं की जिम्मेदारी किसकी है और उस जिम्मेदार पर क्या जुर्माना लगेगा? सड़कों पर घूमने वाले आवारा पशु जैसे सांड, गाय, सूअर,घोड़े, कुत्ते आदि वाहनों के अचानक टकराने से होने वाले हादसों का जिम्मेदार कौन और इसकी भरपाई कौन करेगा? इसी प्रकार कभी सिंग्नल की खराबी के चलते दुर्घटना होती है तो कभी सिंग्नल की बत्ती गुल होने की वजह से। अनेक दुर्घटनाएं व जाम जैसी स्थिति सड़कों पर हर तरफ होने वाले अतिक्रमण की वजह से भी होती हैं।
परन्तु सरकार के पास अतिक्रमण हटाने व पार्किंग का उचित प्रबंध करने जैसी जरूरी व्यवस्था हर जगह उपलब्ध नहीं है। जिसकी वजह से केवल दुर्घटना व जाम की ही स्थिति नहीं बनती बल्कि बेतहाशा प्रदूषण भी फैलता है। अत: सरकार को जनता की जेब पर डाका डालने जैसी व्यवस्थाओं से बाज आना चाहिए और इस नवसंशोधित वाहन अधिनियम 2019 पर पुनर्विचार करना चाहिए। सरकार को देश की जनता की दिनोंदिन बदतर होती जा रही आर्थिक स्थिति पर 'दया करनी चाहिए। सड़कों को गड्ढामुक्त करना चाहिए व आवारा जानवरों के खुलेआम घूमने को रोकने के उपाय तलाशने चाहिए।।
लेकिन हमने नए मोटर अधिनियम के बारे में मित्र पुलिस के अधिकारियों से जानना चाहा तो उसमें पुलिस अधिकारियों में कानून को लेकर समानताएं दिखी, उत्तराखंड पुलिस अधिकारी केआर पांडेय, रवींद्र यादव, रमेश सजवाण, विजय भारती,डीएस कोहली विनोद थपलियाल, महादेव उनियाल, योगेंद्र गुसाईं, आदि तमाम जानकार अधिकारी हैं जो कई मामलों में सक्रिय रहें और आज भी जिम्मेदार पदों पर तैनात हैं। अमूमन सभी लोगों का कहना था की, लोग व्यवस्था पर कमी न निकालें सरकार का मकसद लोगों की सेफ्टी से है। सरकारें जो भी कानून पारित करती हैं, यह सब जनहित में लागू होता है। आज देश मे हत्या कम औऱ सड़क हादसों में लोगों की मौतें अधिक हो रही हैं। जिसका अनुपात पचास गुना अधिक है। सरकार का यह फैसला लोगों के जीवन बचाने में कारगर सिद्ध होगा।। ध्यान देने वाली बात यह है कि जो व्यक्ति यातायात नियमों का पालन करेगा उस पर चालान की कार्यवाही या अधिकाधिक यातायात उल्लंघन मामले में कार्यवाही होगी ही क्यों ? अब यदि जो भी व्यक्ति नए मोटर व्हीकल मामले का उल्लंघन करेगा तो अपराध का भोगी होगा। उसे अपराध की सजा या जुर्माना भुगतना ही पड़ेगा। सरकार का इस बात पर विशेष फोकस है कि लोकतंत्र में समाज का सुरक्षित होना जरूरी है।

