हरीश थपलियाल/ उत्तरकाशी।
पंचायत चुनाव में बेशक महिलाएं ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत और ग्राम पंचायत सदस्य के लिए दावेदारी ठोक रही हैं, लेकिन यह सब कागजों तक ही सीमित है। चुनाव सामग्री में दावेदार महिलाएं नदारद हैं। उनकी जगह उनके पतियों ने ले ली है। पति ही अपनी मजबूत पकड़ के चलते अपनी पत्नियों को जिताने के लिए कोशिश में जुटे हैं। तीन चरणों में प्रस्तावित पंचायत चुनाव को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। तमाम महिला दावेदारों के बड़े-बड़े बैनर-पोस्टर में उनके पति हाथ जोड़े वोट की अपील करते नजर आ रहे हैं
उत्तरकाशी जनपद में 254 ग्राम सभा तथा 120 क्षेत्र पंचायत वार्ड व 12 जिला पंचायत वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। इन पदों के लिए मैदान में एक हजार से अधिक महिलाएं हैं। लेकिन, गांव में स्थिति यह है कि महिला प्रत्याशी अपने नाम से नहीं बल्कि पति के नाम पर वोट मांगने जा रही हैं। महिला अधिकारों को लेकर काम कर रही गणेशपुर गांव की पूर्व प्रधान पुष्पा चौहान कहती हैं कि 99 फीसद जो महिला दावेदार हैं, वो असल में केवल नाममात्र के लिए ही हैं।
चुनाव तो उनके पति लड़ रहे हैं। उन्हीं के गांव में इस बार क्षेत्र पंचायत सदस्य अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित है। जब नामांकन की प्रक्रिया चल रही थी तो क्षेत्र पंचायत सदस्य के निर्विरोध चुनाव के लिए ग्रामीणों ने एक बैठक बुलाई। लेकिन, बैठक में दावेदारी करने वाली महिलाओं के बजाय पति पहुंचे, जिस पर ग्रामीणों ने हैरानी जताई। अपनी पत्नी की ओर से दावेदारी करने वाले पतियों को ग्रामीणों ने घर भेजा और महिलाओं को बैठक में बुलाया।
बैठक में उन महिलाओं के आने में भी देरी हुई। कोई महिला घास के लिए गई थे तो कोई खेतों में काम करने के लिए। उनकी पतियों की जिद के कारण निर्विरोध क्षेत्र पंचायत सदस्य का चुनाव नहीं हो सका। पुष्पा चौहान कहती हैं कि महिलाओं की स्थिति का यह हाल केवल प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य पद पर नहीं है। जिला पंचायत सदस्य पद पर दावेदारी करने वाली महिलाओं का भी यही हाल है। जिन महिलाओं ने अपनी पहचान बताने के लिए अपने पतियों के फोटो पोस्टर बैनर में छापे हैं, उन महिलाओं की समाज में कोई सक्रियता नहीं रही है। महिला सशक्तीकरण को लेकर यह चिंता का विषय है।
