पंचायत चुनाव: जातिवाद विकास में सबसे बड़ी बाधा ! पढ़िए पूरी खबर ?

पंचायत चुनाव: जातिवाद विकास में सबसे बड़ी बाधा ! पढ़िए पूरी खबर ?
जातिवाद
हरीश थपलियाल/ उत्तरकाशी।
पंचायत चुनाव मतदान की तिथि नजदीक आने के साथ ही चुनावी समर जातीय संरचना (सोशल इंजीनियरिंग) के मकड़जाल में उलझता नजर आ रहा है। चुनाव घोषित होने के पहले  गांव तक विकास, भ्रष्टाचार, महंगाई  को लेकर लोग खूब चर्चा करते थे। कहते थे कि चुनाव में प्रतिनिधियों से इसका हिसाब जरूर लेंगे। उन्हें सबक सिखाया जाएगा। साथ ही सरकार को भी जवाब दिया जाएगा, लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है। मतदाता जाति की चर्चा में मशगूल हो गए हैं। उम्मीदवार भी जातीय समीकरण को ही हवा दे रहे हैं और अपने अनुकूल गणित बिठा रहे हैं। जातीय गणित परिणाम को कितना प्रभावित करेगा यह तो गिनती के बाद पता चलेगा, लेकिन प्रत्याशी जातीय व परंपरागत वोट के आधार पर अपनी ही जीत का दावा ठोंक रहा है।

पंचायत स्तर पर राजनीति बिलकुल नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इससे गांव खेमों में बंट जाता है और आपसी वैमनस्य फैलता है। पंचायतें समाज की कोई नई संस्थाएं नहीं हैं। प्रारंभिक चरण से ही पंचायतें  समाज की ग्रामीण व्यवस्था का नेतृत्व करती आई हैं। यह अलग विषय है कि तब पंचायतों के एजेंडे में न तो समाज के सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित होती थी और न ही इनका काम इतना औपचारिक था। आजादी के बाद पंचायतों को ग्रामीण विकास व सामुदायिक विकास का कार्यक्रम दिया गया, लेकिन तब यह प्रयास पूर्ण रूप से सफल इसलिए नहीं हो पाया, क्योंकि इसमें स्थानीय जनता की भागीदारी कम और नौकरशाहों की भूमिका ज्यादा थी। नौकरशाहों ने हद से ज्यादा दखल व मनमर्जी से कार्य किया और नतीजे आज सभी के सामने हैं।

ग्रामीण विकास को वह गति नहीं मिल सकी, जिसकी अपेक्षा थी। पंचायती राज का काला पक्ष भी है। जब तक व्यक्ति और समाज पूर्ण रूप से साक्षर व अपने कर्त्तव्य और अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं होगा, तब तक पंचायतों के कार्यों को संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। आज भी हमारे गांवों में वैचारिक संकीर्णता  हावी दिखती है। यही कारण है कि हर बारी पंचायती चुनावों में विकास  भांति, क्षेत्रवाद व जातिवाद का बोलबाला रहा। ज्यादा आबादी वाले गांव के प्रतिनिधियों में अपने से कम संख्या वाले वोटों के आधार पर उन गांवों को हराने का कार्य किया है। उम्मीदवार क्षेत्रवाद और जातिवाद  के आधार पर अधिक स्थानों में खड़े हुए और जीते। मदिरा और ‘लूण लौटा’ का भी खूब प्रयोग हुआ। उम्मीदवारों की वास्तविक योग्यता को नजरअंदाज किया गया जाता रहा है।

अक्सर ये देखा गया है की जो पंचायतें महिलाओं के लिए आरक्षित थीं, उससे पूर्व प्रधानों में अपनी पत्नियों या रिश्तेदार खड़े करवाकर यह एहसास दिलवाया है कि भविष्य में पंचायत का कार्य वे स्वयं संभालेंगे और संभाल भी तो रहे हैं। उत्तराखंड सरकार ने पंचायती राज संस्था के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता तय करके एक अच्छी शुरुआत की है। हमने पंचायत स्तर तक राजनीति पहुंचा दी है। भले ही चुनाव राजनीतिक पार्टियों के चुनाव चिन्ह पर नहीं होते हैं। लेकिन पंचायत स्तर पर राजनीति बिलकुल नहीं होनी चाहिए। पंचायतें हमारे प्रजातंत्र की सबसे निचली सीढ़ी हैं, इसलिए इसका महत्त्व और भी अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि आर्थिक विकास के लिए पंचायतें महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। उत्तराखंड राज्य  गांवों का प्रदेश है। जब तक ग्रामीण रूप से आर्थिक विकास नहीं होता, प्रदेश का विकास संभव ही नहीं हो पाएगा। पंचायत स्तर तक भ्रष्टाचार रोकने के लिए जरूरी है कि निगरानी तंत्र को मजबूत किया जाए। दूसरा जनता को पूर्ण जागरूक किया जाए।। अंत में ग्राम सभाएं हमारे प्रदेश में संगठनात्मक रूप से तो सफल हो गई, परंतु व्यावहारिक रूप से सफलता के लिए अभी बहुत कार्य करने की आवश्यकता है।

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