दारू-मुर्गा मा न बेचा अपणी वोट, हाँ खबरदार ! कनके होलु तब विकास ?
हरीश थपलियाल।
पंचायत चुनाव में हर बारी मतदाताओं के वोटों की बोली लगाई जाती है। यहां होनहारों को नही बल्कि ऐसे प्रत्याशियों के साथ लोग खड़े हो जाते हैं, जिन्हें अपने क्षेत्र समाज की जानकारी तक नही हो पाती। इसी चर्चा पर आज उत्तरकाशी मुख्यालय से 40 किमी दूर रौंतल गांव पँहुचें। जहाँ एक एक शिक्षित बेरोजगार जगरनाथ बिजल्वाण से भेंट हुई। जो गणित विषय में एमएससी हैं। उनसे काफी देर तक चर्चा हुई की गांव में 40 सालों से खडींचा ही बिछाया जाएगा क्या ? तब उन्होंने बताया की दरअसल चुनावी दौर में लोग अपने निजी स्वार्थ के चक्कर मे अपना स्वाभिमान बेच देते हैं। मगर अपने क्षेत्रीय प्रत्याशियों से ये पूछने की कोई जहमत नही उठा पा रहा है की प्रत्याशी जीत हासिल करने के बाद आखिरकार करेगा क्या ? बस चर्चा सिर्फ इस बात की है की दारू और मीट भात कोन खिलाने में माहिर है ? लेकिन ये गांव के लिए कतई ठीक नही है।
शायद इसीलिए सरकार ने ग्राम प्रधानों की शक्तियों में कटौती की है। जगरनाथ बिजल्वाण के विचारों से हम इतने प्रभावित हुए की काश ! प्रत्येक मतदाता इनके जैसे जागरूक हो जाता तो गांव में शहरों की तर्ज पर सुविधाएं। इसके यदि कोई जिम्मेदार हैं तो कोई और नही हम ही हैं। ध्यान रहे ! हम रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी, बदहाली, बिजली, पानी, सड़क... तमाम छोटी-बड़ी समस्याओं के लिए हम सिस्टम पर अंगुली उठाते आए हैं। क्या हमने कभी गौर किया कि यह सिस्टम आखिर है क्या चीज? जिस पर सारा दोष मढ़कर हम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं, वह सिस्टम आखिर किसने बनाया है? कौन है इन सब झमेलों का दोषी? जनाब, ये सारा किया धरा किसी और का नहीं खुद आपका ही होता है। चौंकिए नहीं। असल कुसूरवार कोई और नहीं खुद आप होते हैं। जी हां, यह सिस्टम आप ही बनाते हैं। वह तंत्र जिसे हम लोकतंत्र कहते हैं, उसमें यदि खामियां दिखें तो समझ लीजिए कि कुसूरवार खुद आप हैं।यह तंत्र आपकी एक अंगुली के इशारे पर बनता और बिगड़ता है। लिहाजा, किसी और पर अंगुली उठाने से पहले खुद की जवाबदेही तय करें। जब अंगुली उठाएं तो पूरी जिम्मेदारी से उठाएं। सोच-समझ कर, सूझ-बूझ कर पूरी सर्तकता से उस बटन को दबाएं, जो हमारे अपने तंत्र यानी लोकतंत्र की बेहतरी तय करती हो। सोच-समझ कर वोट करें।
अपने और देश के असल मुद्दों पर गौर करें। राजनीति को समझें। राजनीतिक दलों को जानें। उनकी नीति और नीयत पर मंथन करें। और फिर, सभी चुनें-सही चुनें। कोई भी स्वतंत्र या फिर किसी राजनीतिक दल की ओर से चुनाव लड़ रहा उम्मीदवार अगर जनता के सामने अपनी राजनीति के सिद्धांत, लोगों के जीवन से लेकर देश और समाज के विकास से जुड़े मुद्दों के बजाय लालच का विकल्प रखता है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि जीत के बाद उसके काम करने का तरीका कैसा होगा! यानी कोई व्यक्ति अगर खुद ही वोट के बदले एक तरह की रिश्वत के तौर पर नकदी, शराब या कोई अन्य सामान देने जैसे भ्रष्ट आचरण की बुनियाद पर खड़ा होता है तो वह अपने काम में ईमानदारी और पारदर्शिता कैसे ला सकेगा! खासतौर पर जब देश में भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या हो, तो मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए अनैतिक और भ्रष्ट तरीके अपनाने वाले उम्मीदवारों से देश के कैसे भविष्य की उम्मीद की जा सकती है? हैरानी की बात है कि जिस दौर में देश में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था से लेकर आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े तमाम मुद्दे ईमानदारी से संबोधित किए जाने और उन पर वास्तव में अमल होने की बाट जोह रहे हैं, वैसे समय में भी कुछ उम्मीदवार महज चुनाव जीतने के लिए मतदाताओं को परोक्ष रूप से रिश्वत देने की कोशिश करते हैं!
क्या यह इसलिए संभव हो पा रहा है कि आज भी आम जनता के बीच पर्याप्त राजनीतिक जागरूकता का विकास होना कहीं बाकी है? यह हकीकत है कि हमारे देश की एक बड़ी आबादी आज भी अपनी रोजाना की जिंदगी में जद्दोजहद करते हुए कई तरह के अभावों से जूझती है। न्यूनतम सुविधाओं और जरूरत के सामानों से भी वंचित कुछ लोगों को जब कोई मामूली सामान देता है तो वे कुछ वक्त के लिए उसके प्रभाव में आ जाते हैं। शिक्षा और जागरूरता की कमी और अभावों से दो-चार जीवन में राजनीतिक चेतना का विकास होना कई बार जटिल होता है। ऐसे में बहुत सारे लोग एक नागरिक के तौर पर अपने अधिकारों को लेकर सजग नहीं हो पाते हैं। इसी का फायदा उठा कर कुछ उम्मीदवार उन्हें कोई सामान या नकदी देकर उनका वोट हासिल करने की कोशिश करते हैं। सवाल है कि मतदाताओं का समर्थन हासिल करने के लिए इस रास्ते को अपनाने वाले उम्मीदवार क्या चुनाव जैसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित नहीं कर रहे हैं? जाहिर है, देश की जनता के राजनीतिक प्रशिक्षण और जागरूकता के लिए ठोस पहलकदमी की जरूरत है, ताकि भविष्य में मुद्दों के बजाय लालच के आधार पर वोट मांगने वाले उम्मीदवारों को जनता अपने स्तर पर ही सबक सिखा सके।
